राम रस बरसे रे मनवा,
राम रस बरसे ।।
मन चातक क्यों तरसे रे मनवा
राम रस बरसे ।
बूँद-बूँद में दया हरि की
बरसे अम्बर से ।।
तू क्यों ओट खड़ा है पगले
भीगन के डर से ।
रे मनवा राम रस…
काम क्रोध, मद, लोभ, मोह का
छत्र हटा सर से ।।
प्रेम नीर में भीग बांवरे
अन्दर बाहर से ।
रे मनवा राम रस…
वृथा डोल रहा वन वन में
खोजत दर दर से ।।
मन मन्दिर में राम बसत है
क्यों न चरण परसे
रे मनवा राम रस…
