ये रथ मेरा, मैं राजा हूँ
बड़ी शान से जीवन सैर करूँ ।।
ये इन्द्रियाँ हैं घोड़े, गलत नहीं दौड़े
लगाम मेरे गुरू ने पकड़ी है ।।
मैं मन बुद्धि का साक्षी हूँ,
बड़ी शान…।।
मैं राजा इस तन का, जीवन के चमन का,
यहाँ पे सदा ही बहारे हैं ।।
जहाँ जाऊँ खुशी पाऊँ
बड़ी शान… ।।
मेरा ना कोई दुश्मन, सभी से है अपनापन
विचारों का सारा है खेल यहाँ
सुजागी का मैं दीप धरूँ,
बड़ी शान… ।।
ये प्रकृति मेरी दासी, मैं पुरूष अविनाशी
मेरे से ही ये सारा जगत है बना
मैं आत्म निश्चय में रहता हूँ,
बड़ी शान… ।
जगत मेरा भूषण, नहीं है ये दूषण
गुरू ने मेरी दृष्टि बदल दी है
मैं सारी सृष्टि में मौज करूँ,
बड़ी शान… ।।
