इतना गुरू से प्यार बढ़े,
कि दो तन इक प्राण हो जाए ।।
गुरू बिन और न कुछ सूझे,
गुरू बिन और न कुछ भाए ।
सतगुरू से आदि का नाता है,
रूहानी जो कहलाता है ।।
सतगुरू से जो प्रेम बढ़ाता है,
सतगुरू भी उसको अपनाए ।
सतगुरू हमारा दाता है,
सतगुरू ही मुक्ति का द्वारा है ।।
सतगुरू से जो नेह लगाता है,
वो गुरू के ही रंग में रंग जाए ।
प्रेम ज्ञान के आवतारे जग में,
स्वयं दादा भगवन प्रगटे हैं ।।
जिसने उनको पहचाना है,
उसका ही जीवन सफल हुआ ।
बड़े भाग से अवसर आया है,
सतगुरू नजरों में समाया है ।।
घर बैठे प्रीतम पाया है,
फिर क्यों न महिमा हम गाये ।
