जाग रे मुसाफिर तू ,
ख्वाब की ये दुनिया से ।।
होश क्यों गँवाया है,
पल दो पल की खुशियों में ।।
दर्द दिल में तू जगा,
सच की राह पाने को ।।
साथ देगा तुझ को निराकार ।।
श्रद्धा है अगर जो अपार ।
कर्म के बंधनो से,
खुद को तूने जकड़ा है ।।
दास्तान कुछ भी नहीं ।।
तू तो मुक्त आत्मा है ।
देख ज़रा नज़रें उठा,
नूर सब में है किस का ।।
मूरत पे नज़र न टिका ।।
हस्ती पे तू ध्यान लगा ।
कर्म काण्ड छोड़ के सभी,
कर्त्ता रोग छोड़ दे अभी ।।
जीवन मुक्ति आनन्द का ।।
सच्चा जलवा लेले अभी ।
हर कदम पे सोच विचार,
आता है क्या मन में अहंकार ।।
मैं-मैं की इस रट को बिसार ।।
बेड़ा होगा तभी तेरा पार ।
सच के मोती हैं बेमिसाल,
दिल की झोली फैला दे विशाल ।।
तन मन में लगन तू लगा ।।
सच की ज्योति दिल में जगा ।
