मुझे आत्मा ब्रह्म, सदा कहने वाले ।
कैसे रसना गुरु, तेरी महीमा गाले ।
स्वपन और सुषोप्त को जानन हारा ।
जाग्रत का मुझसे बना है पसारा ।
झुका सर तेरे दर ये खबर देने वाले ।।
मैं ही ब्रह्मा, विष्णु, मैं ही महेशा ।
दिया सत्गुरु तूने, मुझे ये सन्देशा ।
तूने ही हटाए बादल, अज्ञान के काले ।।
पांच कोश और तीन गुणों का हूँ ज्ञाता ।
जन्म मरण में मैं कभी नहीं आता ।
मेरे योग क्षेम का भार उठाने वाले ।।
साक्षी हूँ मैं अपनी बुद्धि और मन का ।
नहीं वासता मुझसे कोई मेरे तन का ।
मुझे निज स्वरूप का पता देने वाले ।।
