सच्चिदानन्द है तू, ब्रह्मानन्द है तू ।।
जीव माना, बन गया देह में क्यों दीवाना ।।
अपने अज्ञान से भरमाया,
शेर होकर के मैं-मैं मचाया ।।
मेरा घरबार है, मेरा परिवार है, ये खज़ाना,
सिप्पी को चाँदी देख लुभाना ।।
होके अविनाशी जन्मा मरा है,
रस्सी को सर्प जान डरा है ।।
यही परम भूल है, यही शूल है, जो डराना,
झूठे सपने को सच कर के माना ।।
तेरी माया है तुझ को भरमाती,
खेल रच-रच के तुझ को रिझाती ।।
खेल है खेलता, दुःख नित्य झेलता, न अघाना,
चाहे मरूस्थल के जल में नहाना ।।
देह मानुष की हीरा सी पाई,
कर ले अब तू कोई कमाई ।।
शुद्ध दर्पण बना, रूप लख अपना, वो पुराना,
चाहे पूरण आनन्द को पाना ।।
